धीरेंद्र शास्त्री पर अखिलेश का प्रहार : बोले- धन ही इनका धर्म, आयोजकों को दी बड़े नुकसान की चेतावनी
भगवान श्रीकृष्ण पर विवादित टिप्पणी को लेकर सपा प्रमुख ने कथावाचकों को घेरा, आयोजकों से ऐसे लोगों को कार्यक्रमों में न बुलाने की अपील, कहा- सामाजिक वैमनस्य फैलाने वालों की विषबेल को खाद-पानी न दें

लखनऊ, 5 नवंबर 2026:
भगवान श्रीकृष्ण को लेकर विवादित टिप्पणी करने के आरोपों में घिरे कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री पर समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने एक बार फिर निशाना साधा है। उन्होंने ऐसे कथावाचकों को धार्मिक आस्था के बजाय धन और सस्ती लोकप्रियता का भूखा बताते हुए उनके कार्यक्रम आयोजित कराने वाले आयोजकों और प्रायोजकों को भी चेतावनी दी है। अखिलेश ने कहा कि ऐसे लोगों को राजनीतिक संरक्षण मिल सकता है लेकिन स्थानीय जनता के आक्रोश का सामना आयोजकों और प्रायोजकों को करना पड़ेगा।
अखिलेश यादव ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि शासन-प्रशासन के साथ ही ऐसे कथावाचकों के कार्यक्रम कराने वाले सभी आयोजकों और प्रायोजकों को उनसे दूरी बनानी चाहिए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि कुछ तथाकथित कथावाचक बोलने और पहनने से भले ही कथावाचक नजर आते हों लेकिन कथा और प्रवचन उनके लिए महज व्यवसाय हैं। ऐसे लोग समय-समय पर अपनी भौतिक उपलब्धियों का भोंडा प्रदर्शन करते हैं। सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए अनर्गल बयानबाजी करते रहते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे लोगों के लिए धन ही धर्म बन गया है।
सपा प्रमुख ने आयोजकों और प्रायोजकों को आगाह किया कि विवादित बयान देने वाले कथावाचक राजनीतिक प्रश्रय पाकर बच निकल सकते हैं लेकिन कार्यक्रम आयोजित कराने वालों को उसी शहर में जनता के बीच रहना होता है। उनके मुताबिक ऐसे बयानों से पैदा होने वाले सामाजिक वैमनस्य का खामियाजा स्थानीय आयोजकों को भुगतना पड़ सकता है। आस्थावान लोग कथावाचकों के विवादित बयानों में आयोजकों और प्रायोजकों की भी सहमति मान सकते हैं।
दुष्मुखी लोगों के संबंध में ‘शासन-प्रशासन’ के साथ ही उनके कार्यक्रम करवानेवाले सभी आयोजकों और प्रायोजकों से विनम्र आग्रह है कि वो ऐसे तथाकथित कथाकारों से दूर ही रहें। ये ही नहीं, ऐसे एक-दो और भी तथाकथित कथावाचक हैं जो बोलने और पहनने से कथावाचक तो दिखते हैं पर कथा और प्रवचन उनका व्यवसाय है। वो समय-समय पर अपनी भौतिक उपलब्धि का भोंडा प्रदर्शन करते-करवाते रहते हैं। ऐसे लोग सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए सदैव अनर्गल बातें करते हैं। धन ही इनका धर्म होता है।
इसीलिए आयोजकों और प्रायोजकों को ये सोचना चाहिए कि ये कुछ भी कहकर राजनीतिक प्रश्रय पाकर बच निकलेंगे लेकिन उन आयोजकों और प्रायोजकों को तो उसी शहर में जनता के बीच रहना है। इनके कुवचनों से जन्मे सामाजिक वैमनस्य का शिकार उन्हें ही होना पड़ेगा। जब जनता को ये नहीं मिलेंगे तो जनता इन जैसे नकारात्मक लोगों को आमंत्रित करनेवालों
को ही अपने कोप-आक्रोश
का शिकार बनाएगी क्योंकि आस्थावान तो यही मानेंगे कि ये दुर्वचनी भगवानों के बारे में जो अपशब्द या कुविचार प्रकट कर रहे हैं उनमें आयोजकों-प्रायोजकों की भी सहमति है। इससे स्थानीय स्तर पर हर आस्थावान-श्रद्धालु इन आयोजकों-प्रायोजकों का विरोधी हो जाएगा। जो लोग इन जैसों को बुलाकर स्थानीय स्तर पर अपनी धाक जमाना चाहते हैं, वो सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक रूप से बहुत नुक़सान भोगेंगे और जनता की निगाह में उनकी धर्म-विरोधी, भगवान विरोधी छवि बन जाएगी। सामान्य शब्दों में कहा जाए तो उनको ‘लेन के देने’ पड़ जाएंगे , उनकी सारी राजनीति धरी की धरी रह जाएगी।अतः आयोजकों-प्रायोजकों से पुन: आग्रह है कि समाज-सनातन के बीच खाई पैदा करनेवाले ऐसे लोगों को खाद-पानी देकर उनकी विषबेल न बढ़ाएं, न ही ईशनिंदा में भागीदार बनें अन्यथा इनके मौखिक पापों की सज़ा उन्हें भी भुगतनी पड़ेगी।
हमारे देश में ऐसे अनेक सच्चे ‘विचारक-वाचक’ उपलब्ध हैं जो वैदिक-औपनिषदिक बोध की गहराइयों के प्रशांत महासागर हैं तो महाकाव्यों के संदेशों की ऊँचाइयों के हिमालय भी हैं। आयोजक-प्रायोजक उन जैसे सहृदय, सुभाषी, सुधिजनों को आमंत्रित करें और मानवीय जीवन को बेहतर बनाने का पुण्य कमाएं।
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) November 5, 2026
अखिलेश ने कहा कि ऐसे लोगों को बुलाकर स्थानीय स्तर पर अपनी धाक जमाने की कोशिश करने वालों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। उन्होंने इसे ‘लेने के देने पड़ जाना’ करार देते हुए कहा कि ऐसे आयोजकों की धर्म और भगवान विरोधी छवि बन सकती है।
उन्होंने आयोजकों से दोबारा अपील की कि समाज और सनातन के बीच खाई पैदा करने वाले लोगों को बढ़ावा न दें और न ही ईशनिंदा में भागीदार बनें। अखिलेश ने कहा कि देश में अनेक सच्चे विचारक और वक्ता मौजूद हैं। उन्हें वैदिक-औपनिषदिक ज्ञान और महाकाव्यों की समझ है। आयोजकों को ऐसे विद्वानों को आमंत्रित करना चाहिए जो अपने विचारों से समाज और मानवीय जीवन को बेहतर बनाने का काम करें।






