विकास गोंड
वाराणसी, 22 अप्रैल 2026:
वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR) ने करेले की एक नई संकर किस्म ‘काशी अर्पिता’ तैयार की है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह किस्म ज्यादा उत्पादन देने के साथ कई खतरनाक रोगों से भी फसल को बचाने में मददगार है, जिससे किसानों को राहत मिल सकती है।
संस्थान के मुताबिक यह किस्म चूर्णी फफूंद और वायरस से होने वाली बीमारियों के खिलाफ काफी हद तक प्रतिरोधी है। इससे फसल खराब होने का खतरा कम होगा। पैदावार की बात करें तो यह पारंपरिक किस्मों से 15 से 20 फीसदी तक ज्यादा उत्पादन दे सकती है। किसान इससे प्रति हेक्टेयर करीब 25 से 27 टन तक उपज ले सकते हैं।
‘काशी अर्पिता’ के फल गहरे हरे रंग के होते हैं और उन पर मध्यम आकार के कांटेदार उभार दिखते हैं। इसकी लंबाई करीब 15 से 18 सेंटीमीटर और वजन 80 से 85 ग्राम तक रहता है, जो बाजार की मांग के हिसाब से ठीक माना जा रहा है।
इस किस्म की एक खास बात इसका जल्दी तैयार होना है। जहां आम तौर पर करेले की फसल 55 से 60 दिन में पहली तुड़ाई के लिए तैयार होती है, वहीं ‘काशी अर्पिता’ 53 से 58 दिन में ही तैयार हो जाती है। इससे किसानों को फसल जल्दी बाजार में बेचने का मौका मिलता है।
वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. केशव गौतम के अनुसार देश के साथ खाड़ी देशों में भी हरे और कांटेदार करेले की मांग लगातार बढ़ रही है। इसी को ध्यान में रखकर इस किस्म को विकसित किया गया है ताकि किसान बेहतर उत्पादन के साथ नए बाजारों तक पहुंच सकें।
संस्थान के निदेशक डा. राजेश कुमार ने बताया कि इस किस्म में पोषक तत्व और औषधीय गुण भी अच्छे स्तर पर मौजूद हैं। इसमें पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने में सहायक होते हैं। इसकी खेती में कीटनाशकों की जरूरत भी कम पड़ती है, जिससे लागत घटती है। बेहतर गुणवत्ता और ज्यादा उत्पादन के चलते किसानों को बाजार में अच्छे दाम मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
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