
राजकिशोर तिवारी
देहरादून, 9 सितंबर 2026ः
स्वच्छ उत्तराखंड की दिशा में धामी सरकार ने नई पहल की है। अब नई व्यवस्था के तहत कचरे को घर और संस्थानों के स्तर पर ही अलग करने से लेकर उसके वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण तक की प्रक्रिया को मजबूत किया जाएगा। इससे प्रदूषण नियंत्रण में मदद मिलेगी। राज्य में कचरा प्रबंधन की निगरानी के लिए प्रत्येक जिले में विशेष सेल गठित किए गए हैं, जबकि कचरा संग्रहण वाहनों की निगरानी के लिए डिजिटल ट्रैकिंग व्यवस्था लागू की जा रही है। बुधवार को सचिवालय में मीडिया से बातचीत में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने बताया कि अब कचरा चार श्रेणियों में अलग करने का प्रावधान किया गया है।
राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने बताया कि एक अप्रैल 2026 से लागू नए नियमों में सर्कुलर इकोनॉमी, स्रोत पर कचरा पृथक्करण, रीसाइक्लिंग और संसाधनों के दोबारा उपयोग को विशेष महत्व दिया गया है। डॉ. धकाते ने बताया कि वर्ष 2016 के नियमों में कचरे की तीन श्रेणियां थीं, जबकि नए नियमों में इसे गीला कचरा, सूखा कचरा, सैनिटरी कचरा और विशेष देखभाल वाला कचरा चार श्रेणियों में अलग करने का प्रावधान किया गया है। यानी कचरे का पृथक्करण अब घर और प्रतिष्ठान के स्तर से ही सुनिश्चित करना होगा।
उन्होंने कहा कि नए नियमों के तहत 2,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल, प्रतिदिन 40 हजार लीटर से अधिक पानी की खपत अथवा प्रतिदिन 100 किलोग्राम से अधिक ठोस कचरा उत्पादन करने वाले संस्थानों में से किसी एक मानक को पूरा करने वाले प्रतिष्ठान बल्क वेस्ट जनरेटर माने जाएंगे। ऐसे संस्थानों के पंजीकरण के साथ उनके कचरे के प्रसंस्करण व रीसाइक्लिंग की जिम्मेदारी भी तय की गई है।
सचिव ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के 19 फरवरी 2026 के निर्देशों के क्रम में प्रदेश के प्रत्येक जिले में डिस्ट्रिक्ट स्पेशल सेल गठित किए गए हैं। ये सेल शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, डंपिंग साइट व पुराने जमा कचरे यानी लीगेसी वेस्ट के निस्तारण की निगरानी करेंगे। लीगेसी वेस्ट के निस्तारण का लक्ष्य दिसंबर 2026 तक रखा गया है। राज्य में वर्तमान में करीब शत-प्रतिशत डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण का दावा किया गया है। चार श्रेणियों में कचरा अलग रखने की व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए करीब 500 वाहनों में चार अलग-अलग कम्पार्टमेंट तैयार किए जा रहे हैं। डिजिटल व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम से इन वाहनों की आवाजाही और कचरा संग्रहण की निगरानी की जाएगी।
राज्य में प्रतिदिन करीब 1,930 मीट्रिक टन ठोस कचरा उत्पन्न हो रहा है, जबकि लगभग 1,800 मीट्रिक टन कचरे की प्रतिदिन प्रोसेसिंग की जा रही है। प्लास्टिक कचरे का पृथक प्रसंस्करण भी किया जा रहा है। कचरा संग्रहण व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 657 नए वाहन खरीदे जा रहे हैं, जिनमें करीब 480 ई-वाहन शामिल हैं। राज्य में फिलहाल 22 इंटीग्रेटेड सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट, करीब 50 मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी और 600 से अधिक वेस्ट कम्पोस्टर संचालित होने की जानकारी दी गई।
अधिकारियों ने कहा कि नए नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है। नगरीय निकायों, ग्राम पंचायतों, जिला प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और आमजन की सामूहिक भागीदारी से ही उत्तराखंड को स्वच्छ और कचरा-मुक्त बनाने का लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा। इस मौके पर पीआईबी देहरादून के सहायक निदेशक संजीव सुन्दिरयाल और निदेशक शहरी विकास प्रवीण कुमार मौजूद रहे।






