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AI डेटा सेंटर को बिजली देने के लिए Fuel Cell की मांग क्यों बढ़ रही है? जानिए वजह

AI कंपनियां बिजली की कमी और ग्रिड से कनेक्शन मिलने में देरी के बीच नए विकल्प तलाश रही हैं। इसी वजह से Fuel Cell तकनीक पर निवेश तेजी से बढ़ रहा है।

Key Points

  • अमेरिका में बड़े डेटा सेंटर को बिजली के ग्रिड से जोड़ने में 3 से 6 साल लग सकते हैं।
  • Rystad Energy के अनुमान के मुताबिक, डेटा सेंटर के लिए Fuel Cell पर निवेश 2025 के 2.8 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक करीब 30 अरब डॉलर हो सकता है।
  • Fuel Cell से बिजली बनाने पर स्थानीय प्रदूषण कम हो सकता है, लेकिन प्राकृतिक गैस से चलने पर यह पूरी तरह कार्बन-मुक्त नहीं होता।

टेक्नोलॉजी डेस्क,

AI की बढ़ती मांग के साथ डेटा सेंटर को चलाने के लिए ज्यादा बिजली चाहिए। ChatGPT जैसे AI मॉडल को ट्रेन करने, यूजर्स के सवालों का जवाब देने और बड़े कंप्यूटर सिस्टम को ठंडा रखने के लिए लगातार बिजली की जरूरत होती है। लेकिन अमेरिका में कई बड़ी टेक कंपनियों को बिजली के ग्रिड से नया कनेक्शन मिलने में सालों लग सकते हैं।

इस समस्या से निपटने के लिए कंपनियां अब डेटा सेंटर के पास ही बिजली बनाने के विकल्प तलाश रही हैं। इनमें Fuel Cell तकनीक तेजी से चर्चा में आई है। यह तकनीक ईंधन की मदद से बिजली बनाती है और इसे जरूरत के हिसाब से डेटा सेंटर के पास लगाया जा सकता है।

ऊर्जा पर रिसर्च करने वाली कंपनी Rystad Energy के अनुमान के अनुसार, डेटा सेंटर के लिए Fuel Cell पर होने वाला निवेश 2025 में 2.8 अरब डॉलर था। इसके 2030 तक करीब 30 अरब डॉलर पहुंचने का अनुमान है। यह बढ़ोतरी दिखाती है कि AI की दौड़ में अब बिजली जुटाना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।

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AI डेटा सेंटर को इतनी बिजली क्यों चाहिए?

डेटा सेंटर ऐसी जगह होती है जहां हजारों सर्वर और दूसरे कंप्यूटर रखे जाते हैं। ये सर्वर वेबसाइट, ऐप, क्लाउड स्टोरेज और AI सेवाओं को चलाते हैं।

AI सिस्टम को सामान्य कंप्यूटर कामों के मुकाबले कई स्थितियों में ज्यादा कंप्यूटिंग पावर की जरूरत पड़ती है। इसके लिए बड़ी संख्या में GPU जैसे खास प्रोसेसर इस्तेमाल होते हैं। ये प्रोसेसर काफी गर्म भी होते हैं, इसलिए इन्हें ठंडा रखने के लिए कूलिंग सिस्टम लगातार काम करते हैं।

इस तरह डेटा सेंटर में सिर्फ कंप्यूटर ही बिजली नहीं लेते। कूलिंग, बिजली को सही तरीके से बांटने वाले उपकरण और दूसरे सिस्टम भी बिजली इस्तेमाल करते हैं।

बड़ी AI कंपनियों के लिए बिजली की सप्लाई रुकना महंगा पड़ सकता है। इसलिए उन्हें ऐसी व्यवस्था चाहिए जो दिन-रात काम करे और अचानक बिजली की कमी से प्रभावित न हो।

ग्रिड से बिजली मिलने में 3 से 6 साल की देरी क्यों?

बिजली का ग्रिड वह नेटवर्क है जो बिजली बनाने वाली जगहों से घरों, दफ्तरों और उद्योगों तक बिजली पहुंचाता है। बड़े डेटा सेंटर को इस नेटवर्क से जोड़ने के लिए केवल एक तार लगाना काफी नहीं होता।

इसके लिए बिजली की उपलब्धता, ट्रांसफॉर्मर, सबस्टेशन, ट्रांसमिशन लाइन और दूसरी सुविधाओं की जरूरत पड़ सकती है। कई बार नए उपकरण लगाने और जरूरी मंजूरी मिलने में लंबा समय लगता है।

Rystad Energy के अनुसार, अमेरिका में बड़े बिजली लोड को ग्रिड से जोड़ने की प्रक्रिया में 3 से 6 साल तक लग सकते हैं। AI कंपनियों के लिए यह बड़ी समस्या है, क्योंकि वे अपने डेटा सेंटर जल्द शुरू करना चाहती हैं।

मान लीजिए किसी कंपनी ने AI डेटा सेंटर बनाने में अरबों डॉलर लगाए हैं। इमारत और कंप्यूटर तैयार होने के बाद भी अगर पर्याप्त बिजली नहीं मिलती, तो पूरा सिस्टम अपनी क्षमता से काम नहीं कर पाएगा।

इसी वजह से कंपनियां सिर्फ ग्रिड पर निर्भर रहने के बजाय डेटा सेंटर के पास बिजली बनाने के विकल्प अपना रही हैं। Fuel Cell इसी जरूरत को पूरा करने के लिए सामने आया है।

Fuel Cell क्या है और इससे बिजली कैसे बनती है?

Fuel Cell क्या है और इससे बिजली कैसे बनती है

Fuel Cell एक ऐसा उपकरण है जो ईंधन और ऑक्सीजन के बीच होने वाली रासायनिक प्रतिक्रिया से बिजली बनाता है। सामान्य जनरेटर में ईंधन जलाकर इंजन चलाया जाता है। इसके उलट, Fuel Cell में बिजली बनाने के लिए ईंधन का इस्तेमाल इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रिया से होता है।

आसान शब्दों में समझें तो Fuel Cell में ईंधन की ऊर्जा को सीधे बिजली में बदला जाता है। इस्तेमाल होने वाला ईंधन तकनीक के प्रकार के अनुसार अलग हो सकता है। इसमें प्राकृतिक गैस, हाइड्रोजन और कुछ सिस्टम में दूसरे ईंधन शामिल हैं।

Fuel Cell के तीन मुख्य हिस्सों को समझना उपयोगी है:

  • ईंधन: यह प्राकृतिक गैस या हाइड्रोजन जैसा पदार्थ हो सकता है।
  • ऑक्सीजन: आम तौर पर हवा से मिलती है।
  • सेल के अंदर की प्रतिक्रिया: इसी प्रक्रिया से बिजली बनती है। सिस्टम के प्रकार के अनुसार गर्मी और अन्य उत्पाद भी निकल सकते हैं।

कई Fuel Cell सिस्टम में बिजली बनाने के दौरान पारंपरिक दहन नहीं होता। इसलिए उनसे स्थानीय स्तर पर धुआं और कुछ प्रदूषक पारंपरिक दहन वाले उपकरणों की तुलना में कम निकल सकते हैं। हालांकि, वास्तविक उत्सर्जन इस्तेमाल होने वाले ईंधन और सिस्टम की तकनीक पर निर्भर करता है।

डेटा सेंटर में Fuel Cell का इस्तेमाल क्यों बढ़ रहा है?

Fuel Cell की मांग बढ़ने की सबसे बड़ी वजह सिर्फ पर्यावरण नहीं है। टेक कंपनियों को ऐसी बिजली चाहिए जिसे जल्दी उपलब्ध कराया जा सके और जो लगातार मिलती रहे।

1. बिजली के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ सकता

Fuel Cell सिस्टम को डेटा सेंटर के पास लगाया जा सकता है। इससे कुछ परियोजनाओं में ग्रिड कनेक्शन का इंतजार करते हुए भी बिजली उपलब्ध कराने का रास्ता खुल सकता है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर Fuel Cell परियोजना कुछ ही हफ्तों में शुरू हो जाएगी। जगह तैयार करने, मंजूरी, ईंधन की सप्लाई और बिजली से जुड़े उपकरणों को लगाने में भी समय लगता है।

2. दिन-रात बिजली बनाने में मदद

सोलर पैनल से बिजली बनाने के लिए धूप चाहिए। हवा से बिजली बनाने के लिए पर्याप्त हवा जरूरी है। इसके विपरीत, सही ईंधन की लगातार सप्लाई मिलने पर Fuel Cell सिस्टम दिन और रात बिजली बना सकते हैं।

AI डेटा सेंटर के लिए यह खास बात है, क्योंकि उनके सर्वर और कूलिंग सिस्टम को लगातार बिजली चाहिए।

3. जरूरत के हिसाब से क्षमता बढ़ाने का विकल्प

कुछ Fuel Cell सिस्टम मॉड्यूलर होते हैं। इसका मतलब है कि कई यूनिट जोड़कर बिजली बनाने की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।

बड़े डेटा सेंटर में यह उपयोगी हो सकता है। फिर भी, कुल क्षमता बढ़ाने के लिए पर्याप्त ईंधन, जगह, बिजली के उपकरण और दूसरे जरूरी संसाधन उपलब्ध होने चाहिए।

4. बिजली के साथ गर्मी का भी इस्तेमाल

Fuel Cell की कुछ तकनीकें बिजली बनाने के साथ गर्मी भी पैदा करती हैं। खास व्यवस्था होने पर इस गर्मी का इस्तेमाल दूसरे कामों में किया जा सकता है, जैसे कुछ तरह के कूलिंग सिस्टम चलाना।

लेकिन इससे हर डेटा सेंटर में पानी की खपत या कूलिंग की लागत अपने आप कम हो जाएगी, ऐसा नहीं कहा जा सकता। यह साइट की डिजाइन और इस्तेमाल की गई तकनीक पर निर्भर करता है।

Oracle और Bloom Energy क्या कर रहे हैं?

Oracle और Bloom Energy

AI डेटा सेंटर के लिए Fuel Cell के इस्तेमाल का एक बड़ा उदाहरण Oracle और Bloom Energy की साझेदारी है।

13 अप्रैल 2026 को Bloom Energy ने बताया कि Oracle के साथ उसका समझौता अमेरिका में Oracle के क्लाउड और AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 2.8 गीगावाट (GW) तक के Fuel Cell सिस्टम उपलब्ध कराने से जुड़ा है। इसमें से शुरुआती 1.2 GW की क्षमता के लिए अनुबंध किया जा चुका था और उसकी तैनाती शुरू हो गई थी।

गीगावाट बिजली की क्षमता मापने की एक इकाई है। एक गीगावाट, 1,000 मेगावाट के बराबर होता है। इसलिए 1.2 GW का मतलब बहुत बड़े स्तर पर बिजली बनाने की क्षमता है।

Reuters की 23 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, Bloom Energy ने बताया कि Oracle के Utah प्रोजेक्ट में दो महीने से कम समय में बिजली की सप्लाई शुरू कर दी गई थी। यह एक परियोजना का उदाहरण है, न कि हर डेटा सेंटर के लिए तय समय।

इस साझेदारी से पता चलता है कि AI इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने वाली कंपनियां अब बिजली की उपलब्धता को भी अपनी योजना का अहम हिस्सा मान रही हैं।

Fuel Cell की कौन-कौन सी तकनीक इस्तेमाल होती हैं?

डेटा सेंटर के लिए Fuel Cell की अलग-अलग तकनीकें उपलब्ध हैं। इनके काम करने का तरीका, ईंधन और इस्तेमाल अलग हो सकता है।

तकनीक आसान जानकारी
Solid Oxide Fuel Cell (SOFC) उच्च तापमान पर काम करती है। Bloom Energy इस तकनीक का इस्तेमाल करती है। इसके सिस्टम प्राकृतिक गैस से चल सकते हैं और तकनीक शुद्ध हाइड्रोजन के इस्तेमाल के लिए भी तैयार की जा सकती है।
Molten Carbonate Fuel Cell (MCFC) बिजली बनाने के साथ गर्मी भी देती है। खास डिजाइन में इस गर्मी का इस्तेमाल दूसरे कामों में किया जा सकता है।
Proton Exchange Membrane (PEM) हाइड्रोजन से चलने वाली यह तकनीक तेजी से शुरू हो सकती है और बैकअप बिजली जैसे कामों में उपयोगी हो सकती है।

इनमें से कौन-सी तकनीक बेहतर होगी, यह डेटा सेंटर की जरूरत, ईंधन की उपलब्धता, खर्च और सिस्टम की डिजाइन पर निर्भर करता है।

क्या Fuel Cell सच में पर्यावरण के लिए अच्छा है?

Fuel Cell के बारे में सबसे जरूरी बात यह है कि कम स्थानीय प्रदूषण का मतलब शून्य कार्बन उत्सर्जन नहीं है।

इस तकनीक के पर्यावरण पर असर को समझने के लिए यह देखना होगा कि बिजली बनाने में कौन-सा ईंधन इस्तेमाल हो रहा है।

प्राकृतिक गैस से चलने वाला Fuel Cell

आज डेटा सेंटर के लिए चर्चा में आए कई Fuel Cell सिस्टम प्राकृतिक गैस से बिजली बना सकते हैं। इससे बिजली बनाने के दौरान पारंपरिक दहन नहीं होता, लेकिन प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल से कार्बन डाइऑक्साइड निकल सकती है।

इसके अलावा, गैस निकालने और उसे पहुंचाने के दौरान मीथेन का रिसाव भी पर्यावरण पर असर डाल सकता है। इसलिए पूरी प्रक्रिया के उत्सर्जन को देखना जरूरी है।

हाइड्रोजन से चलने वाला Fuel Cell

अगर Fuel Cell में शुद्ध हाइड्रोजन का इस्तेमाल किया जाए, तो सेल के अंदर बिजली बनाते समय मुख्य उत्पाद पानी और गर्मी होते हैं। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि पूरी ऊर्जा व्यवस्था कार्बन-मुक्त है।

हाइड्रोजन बनाने में किस ऊर्जा का इस्तेमाल हुआ, उसे कैसे पहुंचाया गया और उसे स्टोर करने में कितनी ऊर्जा लगी, ये सभी बातें मायने रखती हैं।

उदाहरण के लिए, नवीकरणीय बिजली से बनाया गया ग्रीन हाइड्रोजन कम कार्बन उत्सर्जन वाला विकल्प हो सकता है। वहीं, जीवाश्म ईंधन से बना हाइड्रोजन अपने उत्पादन के दौरान काफी उत्सर्जन पैदा कर सकता है।

इसलिए Fuel Cell को पूरी तरह ग्रीन बताने से पहले उसके ईंधन और पूरी सप्लाई चेन की जांच जरूरी है।

Fuel Cell की सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

इस तकनीक की मांग बढ़ रही है, लेकिन इसके सामने कुछ बड़ी चुनौतियां भी हैं।

  1. शुरुआती खर्च: Fuel Cell सिस्टम लगाने के लिए उपकरण, इंस्टॉलेशन और दूसरी सुविधाओं पर खर्च करना पड़ता है। केवल ग्रिड कनेक्शन में देरी देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि Fuel Cell हर जगह सस्ता पड़ेगा।
  2. ईंधन की लगातार सप्लाई: प्राकृतिक गैस से चलने वाले सिस्टम को गैस की जरूरत होगी। अगर पाइपलाइन या ईंधन की उपलब्धता में समस्या है, तो बिजली बनाने पर भी असर पड़ सकता है।
  3. निर्माण क्षमता: Rystad Energy के अनुसार, Fuel Cell उद्योग की सालाना निर्माण क्षमता 2030 तक करीब 4 GW पहुंचने का अनुमान है। मौजूदा क्षमता लगभग 1.8 GW बताई गई है। अगर मांग तेजी से बढ़ती है, तो कंपनियों के लिए पर्याप्त सिस्टम तैयार करना चुनौती हो सकता है।
  4. दूसरी जरूरी सुविधाएं: Fuel Cell लगाने के लिए केवल मशीन मंगाना काफी नहीं है। परियोजना के लिए जगह, मंजूरी, ट्रांसफॉर्मर, स्विचगियर और ईंधन की व्यवस्था भी जरूरी है। इन कामों में देरी हो सकती है।
  5. लंबे समय का खर्च: सही तुलना करने के लिए उपकरण की कीमत के साथ ईंधन, रखरखाव, मरम्मत और जरूरत पड़ने पर हिस्से बदलने का खर्च भी देखना होगा। उपलब्ध रिसर्च सामग्री में अलग-अलग क्षेत्रों के लिए बिजली की प्रति यूनिट लागत की कोई एक समान तुलना नहीं दी गई है।

इसी वजह से Fuel Cell को हर डेटा सेंटर के लिए सबसे अच्छा विकल्प कहना अभी सही नहीं होगा।

भारत के लिए Fuel Cell की बढ़ती मांग का क्या मतलब है?

भारत के लिए Fuel Cell की बढ़ती मांग का क्या मतलब है

भारत में भी डेटा सेंटर और AI इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार हो रहा है। ऐसे में बिजली की उपलब्धता, भरोसेमंद सप्लाई और पर्यावरण से जुड़े नियम अहम होंगे।

लेकिन भारत में Fuel Cell के इस्तेमाल की स्थिति को अमेरिका से अलग समझना चाहिए।

डेटा सेंटर के लिए बिजली का नया विकल्प

अगर किसी भारतीय डेटा सेंटर को पर्याप्त ग्रिड बिजली मिलने में परेशानी होती है, तो ऑन-साइट बिजली बनाने के विकल्प उपयोगी हो सकते हैं। Fuel Cell भी इनमें से एक विकल्प है।

हालांकि, इसके लिए यह देखना होगा कि संबंधित जगह पर प्राकृतिक गैस या हाइड्रोजन उपलब्ध है या नहीं, सिस्टम लगाने का खर्च कितना है और ग्रिड बिजली के मुकाबले इसका इस्तेमाल कितना व्यावहारिक है।

ग्रीन हाइड्रोजन से जुड़ने की संभावना

भारत के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का लक्ष्य 2030 तक हर साल 5 मिलियन मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करने की क्षमता विकसित करना है।

भविष्य में अगर ग्रीन हाइड्रोजन की उपलब्धता और लागत बेहतर होती है, तो कुछ डेटा सेंटर इसे Fuel Cell में इस्तेमाल करने पर विचार कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए हाइड्रोजन की सप्लाई, स्टोरेज, सुरक्षा और कुल लागत का समाधान जरूरी होगा।

डीजल जनरेटर का विकल्प बन सकता है?

डेटा सेंटर में बिजली जाने पर बैकअप के लिए डीजल जनरेटर का इस्तेमाल किया जाता है। Fuel Cell कुछ स्थितियों में इसका विकल्प या पूरक बन सकता है।

इससे स्थानीय स्तर पर धुआं और कुछ प्रदूषक कम करने में मदद मिल सकती है। लेकिन वास्तविक फायदा ईंधन, सिस्टम और उसकी क्षमता पर निर्भर करेगा। यह भी जरूरी है कि डेटा सेंटर की बिजली की जरूरत के अनुसार बैकअप व्यवस्था तैयार की जाए।

एक अहम सीमा: उपलब्ध रिसर्च में भारत के डेटा सेंटरों में बड़े स्तर पर Fuel Cell लगाने के सत्यापित वाणिज्यिक आंकड़े नहीं मिले। इसलिए भारत में इस तकनीक के इस्तेमाल को अभी बड़े पैमाने पर स्थापित चलन बताना सही नहीं होगा।

क्या Fuel Cell ग्रिड की जगह ले लेगा?

अभी ऐसा मानने की वजह नहीं है कि Fuel Cell हर डेटा सेंटर में पारंपरिक ग्रिड की जगह ले लेगा।

कुछ कंपनियों के लिए ऑन-साइट बिजली बनाना ग्रिड कनेक्शन में देरी से बचने का रास्ता हो सकता है। दूसरी जगह ग्रिड बिजली, सोलर ऊर्जा, बैटरी और बैकअप जनरेटर का मेल ज्यादा उपयोगी हो सकता है।

Rystad Energy के अनुमान के अनुसार, 2030 तक अमेरिका की अनुमानित डेटा सेंटर क्षमता का करीब 40% हिस्सा पूरी तरह ग्रिड पर निर्भर रहने के बजाय ऑन-साइट बिजली के विकल्प अपना सकता है। यह एक अनुमान है, भविष्य का पक्का आंकड़ा नहीं।

Fuel Cell की आगे की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनियां इसे कितनी जल्दी लगा पाती हैं, इसकी लागत कितनी रहती है और लगातार ईंधन की सप्लाई मिलती है या नहीं।

AI की बढ़ती जरूरतों ने यह साफ कर दिया है कि डेटा सेंटर बनाना ही काफी नहीं है। उन्हें चलाने के लिए पर्याप्त बिजली जुटाना भी उतना ही जरूरी है। Fuel Cell इस समस्या को हल करने का एक रास्ता है, लेकिन इसके खर्च और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को समझना भी उतना ही जरूरी है।

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Ashwani Kumar Sagar

अश्वनी कुमार सागर ने वर्ष 2022 में कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की। समय के साथ उन्होंने SEO, डिजिटल कंटेंट स्ट्रैटेजी और सोशल मीडिया मैनेजमेंट में अनुभव हासिल किया। वर्तमान में वे The Ho Halla में SEO एवं सोशल मीडिया मैनेजर और टेक्निकल राइटर के रूप… More »

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