लखनऊ, 23 जून 2026:
यूपी की राजधानी लखनऊ की अलीगंज कॉलोनी में पुरनिया चौराहे के पास तीन मंजिला व्यावसायिक इमारत में हुए भीषण अग्निकांड में 15 छात्रों की दर्दनाक मौत ने सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त रुख से प्रशासन हरकत में आया तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि जिस इमारत में यह त्रासदी हुई उसे 2016 में ही ध्वस्त करने का आदेश जारी किया गया था लेकिन एलडीए अधिकारियों की कथित मिलीभगत से न केवल कार्रवाई टल गई बल्कि आदेश भी निरस्त करा दिया गया।
अब हादसे के बाद लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) ने फिर से ध्वस्तीकरण का नोटिस जारी करते हुए भवन स्वामी से 15 दिन में जवाब मांगा है। अधिकारियों का कहना है कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद इमारत को गिराने की कार्रवाई की जाएगी। सवाल यह है कि यदि 10 वर्ष पहले जारी आदेश पर अमल हो गया होता तो 15 छात्रों की जान बच सकती थी?

जानकारों के अनुसार अवैध निर्माण के मामलों में एलडीए पहले निर्माण रोकने का नोटिस देता है फिर पुलिस की मदद से काम रुकवाने और आवश्यक होने पर सीलिंग की कार्रवाई करता है। इसके बाद मामला एलडीए के विहित न्यायालय में वर्षों तक लंबित रहता है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि मिलीभगत के चलते ऐसे मामले लंबे समय तक लटकाए जाते हैं और अवैध निर्माण बेखौफ चलता रहता है।
उधर अग्निशमन विभाग भी सवालों के घेरे में है। लखनऊ के अग्निशमन अधिकारियों का कहना है कि प्रथमदृष्टया फ्रीजर में आग लगने की आशंका है। आग के कारण भवन का फसाड गिर गया जिससे अंदर फंसे लोग बाहर नहीं निकल सके। ऊपर जाने वाली सीढ़ी भी बंद मिली। इससे बचाव का रास्ता पूरी तरह अवरुद्ध हो गया। उनका कहना है कि भवन की ऊंचाई 15 मीटर से कम होने के कारण यह दमकल विभाग की नियमित एनओसी जांच के दायरे में नहीं आता था।
इस हादसे ने कई विभागों की जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एलडीए पर आवासीय नक्शे वाले भवन में व्यावसायिक गतिविधियां चलने देने, बिजली विभाग पर आवासीय भूखंड पर कॉमर्शियल कनेक्शन देने, दमकल विभाग पर अग्नि सुरक्षा की अनदेखी और शिक्षा विभाग पर बिना मानक पूरे किए कोचिंग संचालन की अनुमति देने के आरोप लग रहे हैं। अब जांच के साथ-साथ दोषियों पर कार्रवाई की मांग भी तेज हो गई है।






