
लखनऊ, 6 अगस्त 2026:
यूपी में मातृ मृत्यु दर (MMR) पर प्रभावी अंकुश लगाने की दिशा में गोरखपुर में प्रायोगिक तौर पर शुरू किया गया ‘मातृ सेवा’ पायलट प्रोजेक्ट पूरे राज्य के लिए एक अनुकरणीय नजीर बनकर उभरा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) और उत्तर प्रदेश टेक्निकल सपोर्ट यूनिट (UPTSU) के संयुक्त तत्वावधान में संचालित इस अनूठी पहल का मुख्य लक्ष्य उच्च जोखिम वाली गर्भवती (High-Risk Pregnancy) माताओं की त्वरित पहचान कर उन्हें बिना समय गंवाए बड़े अस्पतालों में रेफर करना और उनकी जान बचाना है।
महज दो महीने के ट्रायल पीरियड में इस डिजिटल अलर्ट नेटवर्क ने ‘पोस्टपार्टम हैमरेज’ (प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव) से पीड़ित 15 अति-गंभीर महिलाओं को नया जीवन दिया है। अब इसकी अपार सफलता को देखते हुए पड़ोसी जिलों के अति-गंभीर मरीजों को भी इलाज के लिए गोरखपुर भेजा जा रहा है।
डिजिटल नेटवर्क और त्रि-स्तरीय स्वास्थ्य समन्वय
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की मिशन निदेशक डॉ. पिंकी जोवल ने बताया कि इस अभियान की वास्तविक ताकत एक सुव्यवस्थित व्हाट्सएप अलर्ट ग्रुप है। इसमें एम्स (AIIMS), बीआरडी मेडिकल कॉलेज, और जिला महिला अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टरों के साथ-साथ सीएचसी/पीएचसी के मुख्य चिकित्सा अधीक्षकों (CMS), मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO), एएनएम, आशा कार्यकर्ताओं, नर्सेज, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (CHO) और एम्बुलेंस समन्वयकों को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जोड़ा गया है।
जैसे ही कोई आशा कार्यकर्ता या परिजन गर्भवती को ग्रामीण अस्पताल लेकर पहुंचते हैं, टीम तुरंत जोखिम का आकलन करती है। स्थिति गंभीर होने पर केस की पूरी जानकारी और रेफरल डिटेल्स तुरंत व्हाट्सएप ग्रुप पर साझा की जाती है और फोन करके भी टीम को अलर्ट कर दिया जाता है। इससे बीआरडी मेडिकल कॉलेज पहुंचने से पहले ही इमरजेंसी ऑब्सटेट्रिक टीम, वेंटिलेटर और ब्लड बैंक पूरी तरह अलर्ट मोड में आ जाते हैं।
दो महीनों के आंकड़े दे रहे सफलता की गवाही
गोरखपुर के सीएमओ डॉ. राजेश झा के अनुसार 21 मई से शुरू हुए इस दो-महीने के अभियान में कुल 363 उच्च जोखिम वाली गर्भवतियों का इलाज किया गया। इनमें से 55 मामले प्रसवोत्तर अत्यधिक रक्तस्राव (PPH) के थे। ये मातृ मृत्यु का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। इन 55 में से 15 मामले अत्यंत क्रिटिकल थे। इन्हें त्वरित रिस्पॉन्स टीम की मुस्तैदी से सुरक्षित बचा लिया गया। इसके अलावा, 43 अति-गंभीर एनीमिया तथा 19 एक्लम्पसिया (गर्भावस्था में अचानक दौरे पड़ना या बेहोश होना) से पीड़ित महिलाओं को भी समय रहते नया जीवन दिया गया।

देवरिया का मामला : त्वरित समन्वय की जीवंत मिसाल
इस प्रणाली की प्रभावशीलता का सबसे बड़ा उदाहरण देवरिया की 34 वर्षीया रिंकी देवी का केस है। पथरदेवा सीएचसी पर प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव के कारण वह ‘हेमोरेजिक शॉक’ में चली गईं। देवरिया मेडिकल कॉलेज की डॉ. नूपुर श्रीवास्तव की देखरेख में प्राथमिक उपचार के बाद देर रात मरीज को बीआरडी गोरखपुर के लिए रेफर किया गया। देवरिया टीम ने तुरंत गोरखपुर रेफरल ट्रैकिंग टीम को अलर्ट किया। उसने बीआरडी इमरजेंसी को पहले ही तैयार रखा। तड़के 2 बजे मरीज के पहुंचते ही बीआरडी की टीम ने एडवांस रिसेसिटेशन और ब्लड ट्रांसफ्यूजन शुरू किया। इससे महिला की जान बचाई जा सकी।
प्रदेश भर में विस्तार की उम्मीद
सीएमओ डॉ. राजेश झा ने बताया कि दो महीने की इस सफल ट्रायल रिपोर्ट को जल्द ही शासन के वरिष्ठ अधिकारियों को भेजा जाएगा। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ‘मातृ सेवा’ का यह इमरजेंसी रिस्पॉन्स मॉडल उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में लागू किया जाता है तो यह मातृ मृत्यु दर को न्यूनतम स्तर पर लाने का सबसे अचूक और कारगर हथियार साबित होगा।






