
लखनऊ, 20 अगस्त 2026:
यूपी में मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य को सुरक्षित बनाने की दिशा में जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) लगातार असरदार साबित हो रही है। चालू वित्तीय वर्ष में एक अप्रैल से नौ अगस्त तक प्रदेश में 7,17,736 संस्थागत प्रसव हुए हैं। इनमें से 5,43,661 लाभार्थियों को योजना की आर्थिक सहायता का भुगतान किया जा चुका है। बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाओं ने घर के बजाय अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसव को प्राथमिकता दी है।
जननी सुरक्षा योजना के तहत सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसव कराने वाली महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जाती है। ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को 1,400 रुपये और शहरी क्षेत्र में 1,000 रुपये की सहायता मिलती है। योजना का मकसद प्रसव के लिए महिलाओं को स्वास्थ्य संस्थानों तक लाना और प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं से मां व नवजात को सुरक्षित रखना है।
स्वास्थ्य सचिव एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की निदेशक डॉ. पिंकी जोवल के मुताबिक प्रदेश के कई जिलों में योजना के क्रियान्वयन और भुगतान में उल्लेखनीय प्रदर्शन सामने आया है। हाथरस, मैनपुरी, फिरोजाबाद, हरदोई, कानपुर देहात, मुजफ्फरनगर, जौनपुर, बागपत, अम्बेडकरनगर और सोनभद्र में 80 प्रतिशत से अधिक लाभार्थियों को भुगतान किया जा चुका है। पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल तक इन जिलों का प्रदर्शन यह संकेत दे रहा है कि संस्थागत प्रसव के प्रति जागरूकता बढ़ रही है।
सिद्धार्थनगर, बहराइच और अलीगढ़ भुगतान में फिसड्डी
हालांकि, कुछ जिलों में भुगतान की रफ्तार चिंता बढ़ाने वाली है। सिद्धार्थनगर, बहराइच और अलीगढ़ में 50 प्रतिशत या उससे कम लाभार्थियों को भुगतान हुआ है। शासन ने स्थानीय अधिकारियों को सभी बाधाएं दूर कर शत-प्रतिशत लाभार्थियों को भुगतान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
केजीएमयू की स्त्री रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अंजू अग्रवाल के अनुसार संस्थागत प्रसव सिर्फ प्रसव का स्थान बदलना नहीं बल्कि मां और नवजात की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। अस्पताल में प्रसव के दौरान जटिलताओं की समय रहते पहचान, प्रशिक्षित चिकित्सकों की निगरानी, दवाएं, रक्त और आपातकालीन सेवाएं उपलब्ध रहती हैं।
आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका सबसे अहम
इस पूरी व्यवस्था को जमीन तक पहुंचाने में आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका सबसे अहम है। वे गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व जांच, सरकारी योजनाओं और संस्थागत प्रसव के फायदे बताने के साथ जरूरत पड़ने पर उन्हें स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने में मदद करती हैं। यही प्रयास मातृ मृत्यु दर कम करने की दिशा में यूपी की तस्वीर बदलने में अहम साबित हो रहे हैं।






