
न्यूज डेस्क, 7 अगस्त 2026:
जेब में रखा ₹10 या ₹20 का नोट कुछ ही दिनों में मुड़ जाए, किनारों से फटने लगे या पसीने और नमी की वजह से खराब हो जाए, तो यह सिर्फ आपकी परेशानी नहीं है। रोजाना करोड़ों लोगों के हाथों से गुजरने वाले छोटे मूल्यवर्ग के नोट सबसे जल्दी खराब होते हैं। इन्हें बार-बार बदलने में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को हर साल बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। अब इसी समस्या का स्थायी हल तलाशने के लिए RBI एक बार फिर Polymer Notes की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
प्रॉजेक्ट ने पकड़ी तेजी, ट्रायल के सफल होने पर टिका दारोमदार
पिछले डेढ़ महीने में इस परियोजना ने तेजी पकड़ी है। केंद्र सरकार ने ₹10 और ₹20 के पॉलिमर नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दे दी है। RBI की सहायक कंपनी ने इनके लिए जरूरी पॉलिमर सब्सट्रेट तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सबसे अहम बात यह है कि RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पहली बार संभावित समयसीमा बताते हुए कहा है कि अगर ट्रायल सफल रहा तो अगले वित्त वर्ष की शुरुआत से इन नोटों को सीमित तौर पर चलन में लाने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि मौजूदा कागजी नोट बंद होने वाले हैं। सरकार पहले ही साफ कर चुकी है कि यह सिर्फ ट्रायल है। मौजूदा नोट पहले की तरह वैध रहेंगे और लोगों को किसी तरह की जल्दबाजी में नोट बदलवाने की जरूरत नहीं है।
आखिर Polymer Note होता क्या है
‘प्लास्टिक नोट’ सुनते ही अक्सर लोगों के मन में पॉलीथिन जैसा कोई सामान आता है, लेकिन असलियत इससे बिल्कुल अलग है। पॉलिमर नोट सामान्य प्लास्टिक से नहीं बनते। इन्हें BOPP यानी Biaxially Oriented Polypropylene नाम की खास प्लास्टिक फिल्म पर छापा जाता है। यह बेहद मजबूत, लचीली और लंबे समय तक टिकने वाली सामग्री होती है।
अभी चलन में हैं कॉटन और लिनन के रेशों से तैयार नोट्स, होते हैं जल्द खराब
आज भारत में इस्तेमाल होने वाले नोट कॉटन और लिनन के रेशों से तैयार होते हैं। लगातार इस्तेमाल, नमी, धूल और बार-बार मोड़ने की वजह से ये जल्दी खराब हो जाते हैं। पॉलिमर नोट इन कमियों को काफी हद तक दूर करते हैं। ये पानी कम सोखते हैं, आसानी से नहीं फटते और लंबे समय तक साफ बने रहते हैं। यही वजह है कि दुनिया के कई देशों ने छोटे मूल्यवर्ग के नोटों के लिए इसी तकनीक को अपनाया है।
Polymer में Security फीचर भी होंगे ज्यादा मजबूत
RBI सिर्फ नोटों की उम्र बढ़ाने के लिए Polymer Notes नहीं ला रहा है। इसका दूसरा बड़ा उद्देश्य नकली नोटों पर लगाम लगाना है। पॉलिमर नोटों में पारदर्शी विंडो, होलोग्राम, मेटैलिक सिक्योरिटी फीचर, रंग बदलने वाले पैटर्न और उभरे हुए टैक्टाइल मार्क जैसे आधुनिक सुरक्षा फीचर लगाए जा सकते हैं। इनकी नकल करना सामान्य कागजी नोटों की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल माना जाता है। दृष्टिबाधित लोगों के लिए भी ऐसे नोट ज्यादा सुविधाजनक हो सकते हैं क्योंकि इन पर बने स्पर्श चिन्ह लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं।
छोटे नोटों से ही शुरुआत क्यों
RBI ने पहले चरण के लिए ₹10 और ₹20 के नोट चुने हैं। इसकी वजह भी साफ है। यही दोनों मूल्यवर्ग सबसे ज्यादा हाथ बदलते हैं। छोटे कारोबार, सार्वजनिक परिवहन, बाजार, चाय की दुकान, सब्जी मंडी और रोजमर्रा के लेनदेन में इनका सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। इसी कारण ये सबसे पहले खराब भी होते हैं। RBI का मानना है कि अगर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नोटों की उम्र बढ़ जाती है तो पूरे करेंसी मैनेजमेंट सिस्टम पर सकारात्मक असर पड़ेगा।
पिछले डेढ़ महीने में कैसे बदली तस्वीर
Polymer Notes लंबे समय से चर्चा में थे, लेकिन जून 2026 के आखिर से घटनाक्रम तेजी से बदला।
सबसे पहले RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने सार्वजनिक तौर पर संकेत दिया कि केंद्रीय बैंक फिर से पॉलिमर करेंसी की संभावना पर गंभीरता से काम कर रहा है। हालांकि उस समय उन्होंने इसे शुरुआती चरण बताया था। इसके बाद 17 जुलाई 2026 को RBI की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) ने भारत में Polymer Substrate Factory लगाने के लिए ग्लोबल एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट जारी किया। यही इस परियोजना का पहला बड़ा तकनीकी कदम माना गया।
फिर 27 जुलाई 2026 को मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लिखित जवाब में बताया कि केंद्र सरकार ने RBI के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके तहत ₹10 और ₹20 के 100-100 करोड़ नोट फील्ड ट्रायल के लिए तैयार किए जाएंगे। उन्होंने यह भी बताया कि प्रस्ताव RBI अधिनियम 1934 की धारा 25 के तहत RBI के केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश पर सरकार के पास भेजा गया था।
अगले वित्तीय वर्ष में मैदान में लाने की तैयारी
सबसे अहम अपडेट 5 अगस्त 2026 को आया। मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के बाद मीडिया से बातचीत में RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि पायलट ट्रायल की तैयारी चल रही है। अगर इसके नतीजे उम्मीद के मुताबिक रहे तो अगले वित्त वर्ष यानी अप्रैल 2027 से Polymer Notes को चलन में लाने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने यह भी साफ किया कि अभी कोई अंतिम तारीख तय नहीं हुई है। पहले ट्रायल के दौरान अलग-अलग मौसम, अलग-अलग इलाकों और रोजमर्रा के इस्तेमाल में इन नोटों के प्रदर्शन का आकलन किया जाएगा। इसके बाद ही बड़े स्तर पर फैसला लिया जाएगा।
भारत में यह पहली कोशिश नहीं
Polymer Notes की कहानी 2026 से शुरू नहीं होती। RBI ने पहली बार 2009 में इस तकनीक पर विचार शुरू किया था। उस समय भी मकसद नकली नोटों पर रोक लगाना और जल्दी खराब होने वाले नोटों की समस्या का हल निकालना था। करीब तीन साल की तैयारी के बाद 2012 में सरकार ने ₹10 के पॉलिमर नोटों का ट्रायल करने का फैसला लिया। इसके लिए जयपुर, शिमला, भुवनेश्वर, मैसूर और कोच्चि जैसे अलग-अलग मौसम वाले शहर चुने गए थे। योजना थी कि इन इलाकों में नोटों के प्रदर्शन का अध्ययन किया जाएगा।
हालांकि तकनीकी दिक्कतों और खरीद प्रक्रिया में देरी के कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। बाद में 2016 की नोटबंदी के बाद RBI की प्राथमिकताएं बदल गईं और यह योजना कई साल तक ठंडे बस्ते में पड़ी रही। अब करीब एक दशक बाद यह परियोजना नए सिरे से शुरू हुई है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सरकार की मंजूरी, उत्पादन की तैयारी और RBI गवर्नर की संभावित समयसीमा तीनों एक साथ सामने आ चुके हैं। इससे माना जा रहा है कि इस बार परियोजना पहले की तुलना में ज्यादा गंभीरता से आगे बढ़ रही है।
सरकार और RBI ने क्या कहा, सबसे अहम बातें
Polymer Notes को लेकर सबसे ज्यादा सवाल यही उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में कागजी नोट पूरी तरह बंद हो जाएंगे। इस पर सरकार और RBI दोनों ने स्थिति साफ कर दी है। संसद में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने कहा कि फिलहाल पेपर करेंसी को पूरी तरह बदलने का कोई प्रस्ताव नहीं है। यानी ₹10 और ₹20 के मौजूदा नोट पहले की तरह चलते रहेंगे। Polymer Notes सिर्फ फील्ड ट्रायल के लिए लाए जा रहे हैं। ट्रायल सफल रहने पर ही आगे का फैसला होगा।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि नकद और Digital Payment को एक-दूसरे का विकल्प नहीं माना जा रहा। UPI, डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, Digital Rupee और नकद भुगतान सभी अपनी-अपनी जरूरत के हिसाब से आगे भी इस्तेमाल होते रहेंगे। इसलिए Polymer Notes को डिजिटल भुगतान के खिलाफ किसी कदम के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
करेंसी मैनेजमेंट सिस्टम पर पड़ेगा पॉजिटिव असर
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी कहा कि छोटे मूल्यवर्ग के नोट सबसे ज्यादा हाथ बदलते हैं और सबसे पहले खराब होते हैं। अगर उनकी उम्र बढ़ जाती है तो पूरे करेंसी मैनेजमेंट सिस्टम पर सकारात्मक असर पड़ेगा। उन्होंने यह भी बताया कि दुनिया के कई देशों में पॉलिमर नोट 30 साल से भी ज्यादा समय से सफलतापूर्वक इस्तेमाल किए जा रहे हैं। भारत भी उसी अनुभव का अध्ययन कर रहा है, लेकिन किसी भी बड़े फैसले से पहले भारतीय परिस्थितियों में इनका व्यापक परीक्षण किया जाएगा।

फील्ड ट्रायल में किन बातों की होगी जांच
RBI सिर्फ नोटों की मजबूती नहीं देखेगा। ट्रायल के दौरान यह भी परखा जाएगा कि अलग-अलग मौसम में नोटों का प्रदर्शन कैसा रहता है, पानी और नमी का कितना असर पड़ता है, बार-बार मोड़ने के बाद उनकी स्थिति कैसी रहती है और आम लोग उन्हें कितनी आसानी से स्वीकार करते हैं। इसके अलावा बैंक, ATM, Cash Deposit Machine और नोट गिनने वाली मशीनों के साथ इनकी अनुकूलता भी जांची जाएगी। ट्रायल का उद्देश्य सिर्फ नई तकनीक लाना नहीं, बल्कि यह तय करना भी है कि भारतीय परिस्थितियों में यह तकनीक कितनी सफल हो सकती है।
Polymer Notes के बड़े फायदे
– पॉलिमर नोटों का सबसे बड़ा फायदा उनकी लंबी उम्र है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताता है कि ये सामान्य कागजी नोटों की तुलना में ढाई से चार गुना ज्यादा समय तक चल सकते हैं। इसका मतलब यह है कि RBI को बार-बार नए नोट छापने की जरूरत कम पड़ेगी।
– इन नोटों पर पानी, नमी और धूल का असर भी कम होता है। यही वजह है कि लंबे समय तक इस्तेमाल के बाद भी ये अपेक्षाकृत साफ दिखाई देते हैं।
– सुरक्षा के लिहाज से भी इन्हें बेहतर माना जाता है। पारदर्शी विंडो, होलोग्राम, मेटैलिक फीचर और रंग बदलने वाले सुरक्षा पैटर्न की वजह से नकली नोट बनाना काफी मुश्किल हो जाता है।
– दृष्टिबाधित लोगों के लिए भी ये नोट मददगार साबित हो सकते हैं क्योंकि इन पर बने उभरे हुए स्पर्श चिन्ह ज्यादा समय तक बने रहते हैं।
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
– Polymer Notes के सामने कुछ बड़ी चुनौतियां भी हैं। सबसे पहली चुनौती शुरुआती लागत है। विशेषज्ञों के मुताबिक इन्हें तैयार करने में कागजी नोटों की तुलना में 30 से 60 प्रतिशत तक ज्यादा खर्च आ सकता है।
– दूसरी चुनौती पॉलीप्रोपाइलीन जैसे कच्चे माल की उपलब्धता है। भारत अभी भी इसकी कुछ जरूरत आयात से पूरी करता है। यही वजह है कि BRBNMPL देश में Polymer Substrate Factory लगाने की दिशा में काम कर रहा है।
– तीसरी चुनौती लोगों की आदतें हैं। भारत में लोग नोट मोड़कर रखते हैं, जेब में दबाकर रखते हैं, गुल्लक में डालते हैं और धार्मिक स्थलों पर चढ़ाते हैं। पॉलिमर नोटों का टेक्सचर थोड़ा अलग होता है। इसलिए RBI पहले यह देखना चाहता है कि आम लोग इन्हें कितनी आसानी से अपनाते हैं।
दुनिया का अनुभव क्या कहता है
– Polymer Currency अपनाने वाला पहला देश ऑस्ट्रेलिया था। उसने 1988 में इसकी शुरुआत की थी। धीरे-धीरे वहां सभी मूल्यवर्ग के नोट पॉलिमर में बदल दिए गए।
– आज कनाडा, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, ब्राजील, सऊदी अरब, रोमानिया, नाइजीरिया समेत 60 से ज्यादा देश किसी न किसी रूप में Polymer Notes का इस्तेमाल कर रहे हैं।
– ज्यादातर देशों में इन नोटों की उम्र बढ़ने और नकली नोटों में कमी आने का फायदा मिला है। हालांकि कुछ देशों में शुरुआती दौर में गर्म मौसम और ज्यादा नमी की वजह से नोटों के आपस में चिपकने जैसी शिकायतें भी आई थीं, जिन्हें बाद में तकनीकी बदलाव के जरिए काफी हद तक दूर कर दिया गया।
– आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा
– फिलहाल आम लोगों के लिए सबसे जरूरी बात यही है कि किसी तरह की घबराहट की जरूरत नहीं है। मौजूदा ₹10 और ₹20 के नोट पहले की तरह चलते रहेंगे। किसी को बैंक जाकर नोट बदलवाने की जरूरत नहीं होगी।
– जब Polymer Notes बाजार में आएंगे तो उनकी पहचान आसान होगी। इनमें पारदर्शी विंडो होगी, सतह सामान्य नोटों से अलग होगी और सुरक्षा फीचर भी नए होंगे। शुरुआत में सीमित संख्या में इन्हें जारी किया जाएगा। ट्रायल सफल रहने पर ही आगे बड़े स्तर पर फैसला लिया जाएगा।
– RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अप्रैल 2027 से शुरुआत का लक्ष्य जरूर बताया है, लेकिन उन्होंने यह भी साफ किया कि अंतिम फैसला ट्रायल के नतीजों के बाद ही लिया जाएगा।
फिलहाल आने वाले महीनों में Polymer Substrate Factory, नोटों के उत्पादन, ट्रायल वाले इलाकों और शुरुआती रिपोर्ट पर सभी की नजर रहेगी। इन्हीं नतीजों से तय होगा कि Polymer Notes भविष्य में भारतीय करेंसी का स्थायी हिस्सा बनेंगे या नहीं।






