
लखनऊ, 9 सितंबर 2026:
यूपी बार कौंसिल ने सेंट्रल बार एसोसिएशन लखनऊ के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और महामंत्री अवनीश दीक्षित के खिलाफ कड़ा अनुशासनात्मक कदम उठाया है। दोनों पदाधिकारियों का अधिवक्ता रजिस्ट्रेशन तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। इतना ही नहीं दोनों को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा गया है कि अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 के तहत उनका पंजीकरण हमेशा के लिए निरस्त क्यों न कर दिया जाए।
यह कार्रवाई यूपी बार कौंसिल की वर्चुअल आपात बैठक में पूर्व अध्यक्ष एवं सदस्य देवेंद्र मिश्र नगरहा के प्रस्ताव पर विचार के बाद की गई। बैठक में पूरे घटनाक्रम पर चर्चा हुई और कौंसिल ने दोनों पदाधिकारियों के कृत्य को गंभीर अनुशासनात्मक मामला माना।
दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के आदेश के क्रम में यूपी बार कौंसिल ने 23 अगस्त को एक प्रस्ताव पारित किया था। इसके तहत सेंट्रल बार एसोसिएशन लखनऊ का चुनाव कराने के लिए पहले से गठित एल्डर्स कमेटी को अधिकृत किया गया था। चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष तरीके से पूरा कराने के लिए कौंसिल ने अपने पांच सदस्यों श्रीनाथ त्रिपाठी, इमरान माबूद खान, मधुसूदन त्रिपाठी, देवेंद्र मिश्र नगरहा और श्रीश कुमार मेहरोत्रा को पर्यवेक्षक भी नियुक्त किया था।
आरोप है कि इसके बाद सेंट्रल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और महामंत्री ने अपने सदन में प्रस्ताव रखकर बार कौंसिल के इस आधिकारिक निर्णय को खारिज कर दिया। यूपी बार कौंसिल ने इसे अपने अधिकार और संस्थागत गरिमा के खिलाफ गंभीर कदम माना। कौंसिल के मुताबिक यह कृत्य असंवैधानिक होने के साथ-साथ बार कौंसिल की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला है।

इसी आधार पर इसे अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 के तहत व्यावसायिक कदाचार की श्रेणी में मानते हुए बहुमत से दोनों का रजिस्ट्रेशन निलंबित करने का फैसला लिया गया। अब पूरे मामले की सुनवाई बार कौंसिल के अध्यक्ष शिवकिशोर गौड़ और प्रतिनिधि सदस्य श्रीनाथ त्रिपाठी की अनुशासन समिति करेगी। समिति दोनों पक्षों को सुनने के बाद आगे का अंतिम आदेश पारित करेगी।






