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कसमंडी कला में मंदिर या मकबरा? पुराने ढांचे पर उठे सवाल, पासी समाज ने रखी जांच की मांग

किले और शिव मंदिर होने का दावा कर रहे पासी समाज ने पुरातत्व विभाग से कार्बन डेटिंग की मांग उठाई, दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय ने इसे पीढ़ियों पुराना मकबरा बताते हुए विवाद को बेबुनियाद कहा, गांव में पुलिस व पीएसी तैनात

प्रमोद कुमार

मलिहाबाद (लखनऊ), 22 मई 2026:

लखनऊ के मलिहाबाद इलाके के कसमंडी कला गांव में एक पुराने ढांचे को लेकर विवाद गहरा गया है। पासी समाज ने दावा किया है कि यह 11वीं सदी के वीर राजा कंस पासी का किला और शिव मंदिर है, जिसे बाद में मकबरे का रूप दे दिया गया। मामले ने तूल पकड़ा तो लाखन आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सूरज पासी समर्थकों के साथ गांव पहुंचे इसके बाद डीएम को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा।

गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के पीछे मौजूद इस पुराने ढांचे को लेकर दोनों समुदाय आमने-सामने हैं। पासी समाज का कहना है कि दीवारों पर नाग, कलश और फूलों जैसी आकृतियां बनी हैं, जो हिंदू स्थापत्य की पहचान मानी जाती हैं। उनका दावा है कि यहां बाद में कब्रनुमा ढांचा तैयार किया गया।

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सूरज पासी ने कहा कि यह राजा कंस पासी का किला और मंदिर है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐतिहासिक पहचान मिटाने की कोशिश की गई। पासी समाज ने पुरातत्व विभाग से कार्बन डेटिंग, वैज्ञानिक सर्वे और विस्तृत जांच कराने की मांग की है। पासी समाज का यह भी कहना है कि अंदर बनी समाधि हाल के वर्षों में तैयार की गई है। उनका दावा है कि ढांचे के बाहर लगा बोर्ड भी नया है और दो साल पहले तक यहां नमाज नहीं पढ़ी जाती थी।

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वहीं मुस्लिम समुदाय ने इन दावों को खारिज किया है। कसमंडी कला के लुकमान अंसारी का कहना है कि यह बहुत पुराना मकबरा है और यहां लंबे समय से नमाज पढ़ी जाती रही है। सुन्नी समाज से जुड़े जमाल मास्टर ने कहा कि उनके बुजुर्ग भी यहां इबादत करते थे, ऐसे में अचानक इसे मंदिर बताना सही नहीं है।

विवाद बढ़ने के बाद गांव में पुलिस बल और पीएसी तैनात कर दी गई है। प्रशासन ने फिलहाल यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। एसडीएम मलिहाबाद ने बताया कि ज्ञापन मिल गया है और पुरातत्व विभाग से जांच कराई जाएगी। रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई तय होगी।

स्थानीय लोगों के मुताबिक यह ढांचा चूना, उड़द की दाल, गुड़ और रावीश के मिश्रण से तैयार किया गया था। दरवाजे और चौखट पत्थर के बने बताए जा रहे हैं। पासी समाज लगातार इसकी वैज्ञानिक जांच की मांग कर रहा है।

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