प्रयागराज, 11 जून 2026:
प्रयागराज में अधिवक्ता जागृति शुक्ला की मौत के बाद डॉक्टरों और वकीलों के बीच शुरू हुए विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने पूरे मामले की न्यायिक जांच कराने का आदेश देते हुए सेवानिवृत्त न्यायाधीश अरुण टंडन को जांच की जिम्मेदारी सौंपी है। साथ ही साफ कहा है कि किसी भी हालत में आम लोगों को इलाज या आवाजाही की सुविधा से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने कहा कि डॉक्टरों की हड़ताल हो या वकीलों का प्रदर्शन, दोनों के कारण आम नागरिकों को परेशानी नहीं होनी चाहिए। यदि कोई समूह सड़क जाम करता है या यातायात बाधित करता है तो जिला प्रशासन और पुलिस कानून के तहत उपलब्ध सभी अधिकारों का इस्तेमाल कर व्यवस्था बहाल करें। जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग भी किया जा सकता है।
अदालत ने माना कि 20 मई को हुई घटना और उसके बाद के हालात बेहद गंभीर हैं। कोर्ट ने कहा कि जिला प्रशासन की जांच की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ सकते हैं, इसलिए स्वतंत्र न्यायिक जांच जरूरी है। जांच रिपोर्ट 30 सितंबर तक सीलबंद लिफाफे में हाईकोर्ट में पेश की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई को तय की गई है।
यह है पूरा मामला
कोर्ट में पेश तथ्यों के मुताबिक 20 मई की सुबह अधिवक्ता जागृति शुक्ला क्रिकेट खेलने जाते समय सड़क हादसे में घायल हो गई थीं। उन्हें तत्काल स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल ले जाया गया। आरोप है कि ड्यूटी पर मौजूद इमरजेंसी मेडिकल अधिकारी ने समय पर इलाज नहीं किया। महिला अधिवक्ताओं के साथ अभद्र व्यवहार के आरोप भी लगे, जिसके बाद अस्पताल परिसर में डॉक्टरों और वकीलों के बीच विवाद बढ़ गया। बाद में जागृति शुक्ला को निजी अस्पताल ले जाया गया और फिर लखनऊ स्थित एसजीपीजीआई रेफर किया गया, जहां 7 जून को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
इन बिंदुओं पर होगी जांच
हाईकोर्ट ने न्यायिक जांच अधिकारी को यह पता लगाने की जिम्मेदारी दी है कि जागृति शुक्ला को अस्पताल पहुंचने के बाद समय पर और जरूरी इलाज मिला था या नहीं। उपलब्ध कराई गई चिकित्सा सेवा तय मानकों के अनुरूप थी या नहीं और उनकी मौत किसी तरह की चिकित्सीय लापरवाही का नतीजा थी या नहीं।
इसके अलावा डॉक्टरों, अस्पताल कर्मचारियों और अधिवक्ताओं के बीच हुए टकराव के लिए कौन जिम्मेदार था, ट्रॉमा सेंटर में तैनात पुलिसकर्मियों ने हालात संभालने के लिए क्या कदम उठाए और आपातकालीन सेवाएं सुचारु रखने में उनकी क्या भूमिका रही, इसकी भी जांच की जाएगी।
डॉक्टरों की गिरफ्तारी पर फिलहाल रोक
सुनवाई के दौरान पुलिस की केस डायरी अदालत के सामने रखी गई। कोर्ट ने पाया कि विवेचक ने अब तक किसी आरोपी डॉक्टर की गिरफ्तारी जरूरी नहीं समझी है। इसे देखते हुए अदालत ने कहा कि फिलहाल किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं की जाएगी। यदि किसी को गिरफ्तार किया गया है तो उसे निजी मुचलके पर रिहा किया जाए। हालांकि मामले की विवेचना जारी रहेगी।
ड्यूटी पर लौटने का आदेश, नहीं माने तो निलंबन
हाईकोर्ट ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी, मेडिकल कॉलेज प्रशासन और एसआरएन अस्पताल को निर्देश दिया कि हड़ताल पर गए डॉक्टर और कर्मचारी तुरंत काम पर लौटें। आदेश का पालन न करने वालों को तत्काल निलंबित किया जाए और इसकी जानकारी अदालत को दी जाए। यह निर्देश प्रदेश के अन्य सरकारी चिकित्सा संस्थानों पर भी लागू होगा।
अवमानना की चेतावनी
कोर्ट ने साफ किया कि उसके आदेशों की अनदेखी करने वाले डॉक्टर, वकील, शिक्षक, कर्मचारी या किसी भी सरकारी चिकित्सा संस्थान के कर्मी के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग भी बनेगा पक्षकार
सरकारी अस्पतालों में बार-बार होने वाली हड़तालों पर चिंता जताते हुए हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को भी मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है। अदालत का कहना है कि भविष्य में ऐसी स्थितियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आयोग की भूमिका भी जरूरी है।






